Bronson and Opi
Sunday, 23 October 2011
दुखी दिन - अस्पताल
दो हफ्ते पहले मैं अस्पताल गयी. शुक्रवार को, मैं डॉक्टर के पास गयी और मारा एक रक्त का परिक्षण हुआ. डॉक्टर ने मुझे कहा "सीता, आप क्या बात है?" और मैं ने कहा "डॉक्टर जी, मेरे शारीर में दर्द नहीं हुआ, लकिन मेरा चहरे पर फुन्सी है. क्या हो गया?" डॉक्टर ने कहा कि मारा "प्लेटलेट काउंट" बहुत कम है. एक स्वस्थ लोग का काउंट एक सौ पचास हज़ार के उपर था, लकिन मारा काउंट तीन हज़ार था. मैं बहुत हिरन थी! मैं बहुत अच्छा महसूस कर रही थी, लकिन मैं बेमार थी! उस रात को, मैं अस्पताल गयी. मारी दो सहलियां, एमिली और कैरी, मेरे साथ आई. मेरे पापा यास्त लान्सिंग से एन आर्बर आया. (अस्पताल जाने के बाद, मैं ने मेरे माता-पिता को अस्पताल के बारे में फ़ोन किया. वे बहुत हिरन थे और मेरे पिता फौरन गाड़ी से एन आर्बर आई!)
जब हम अस्पताल पहुंचे, दाई ने कहा के हम को इन्तिज़ार करना पड़ता है. हाय रे! मैं बहुत थक गयी और मैं लेटना चाहती थी. ग्यारा बजे उन्होने मुझे एक पलंग दिया. दुसरी डॉक्टर मेरे देखने के लिये आई. उस ने भी कहा के मेरा "प्लेटलेट काउंट" बहुत कम हाय. है भगवन - मुझे मालूम है! फिर, एक दाई ने मुझको दवा (तीन गोलियां) दी.
सारे वीकेंड में, मैं अस्पताल में रहेती थी. मैं घर जाना चाहती थी! स्कूल में, मेरे बहुत परिक्षण थे, लकिन मैं अस्पताल में थी तो मैं पढ़ नहीं सकती थी. हाय राम! यह बहुत दुखी दिन था.
Saturday, 22 October 2011
उदासी - शिवानी सदवाल
दो साल पहले, मेरे पिताजी अचानक बहुत बीमार थे. वे हॉस्पिटल में कुछ महीने से रह रहे थे. हर रोज़ मेरी दादीजी उनके पास वक़्त बिताते थे हॉस्पिटल में. उनको बहुत दुःख लगता था मेरे दादाजी को इस हालत में देखकर. लेकिन इतना सारा स्ट्रेस, दुख, और उदासी अच्छा नहीं होता है. दादाजी को होप्सितल में चार महीने होकर मेरी दादीमा को हार्ट अटक हुआ. यह रात में हुआ, जब मैं घर में निचे टी वी देख रही थी और मेरी मम्मी ने चीखा. मैं यह सुनकर एकदम ऊपर भागी और देखा की कुछ बुरा हुआ और मैं उस समय 911 को फ़ोन किया. अमबुलंस आई और मैं अधि रात तक उठी रही पर मम्मी और दादीमा वापस नहीं आये. मैं थककर सो गयी और मुझे विश्वास था की उटकर सब तीख होगा और वे वापस नहीं आये क्योंकि शायद कुछ टेस्ट करने पड़े थे. पर जब मैं सवारे उठी, मम्मी और पापा बिलकुल चुप थे. मैं समझी की वेह थके हुए थे और हम दादीमा को बाद में होप्सितल से घर ले आएंगे. लेकिन यह तो सिर्फ मेरी दिल की इच्छा थी. ब्रेअक्फ़स्त खाने के बाद जब मेरी मम्मी ने मुह खोला बात करने के लिए, मेरे आंसू टपकने शुरू हुए. मुझे पता था की कुछ गलत था, और मम्मी ने बताया की मेरी दादीमा इस दुनिया में नहीं रहे. मैं समझ नहीं पाई की यह क्यों हो रहा था, और मैं स्कूल गयी पर मैं उदासी नहीं चुप पाई. मेरे दोस्त बार-बात पूछने लगे की क्या हुआ की मैं इतनी उदास लग रही थी, लेकिन मैं मुह खोल कर कुछ नहीं कह पाई. मेरी दादीमा मेरे से बहुत करीब थे. मैं उनको कुछ भी बता सकती टी, और क्योंकि वे मेरे साथ हमारे घर में रहते थे, मुझे इतना ग़म महसूस हुआ की मैं आज तक दिन भर उदास होती हूँ. लेकिन ज़िन्दगी मैं बुरी खबरे आती रहती है और कुछ न कुछ होता रहता है, और ताकत के सात जीना पर्ड़ता है, मैंने यह सीखा है.
एक दुखद दिन - रितिश
छे साल पहले मैं हाई स्कूल शुरू कर रहा था. मैं थोरा डर था क्यों कि हाई स्कूल में बहुत सारे लोगे थे. मेरे पिछले स्कूल बहुत छोटा था. मेरा कलास में सिर्फ बारह लोगे थे. मुझे बास्केटबाल खेलने बहुत पसंद था तो मैंने सोचा कि मैं बास्केटबाल का टीम के लिए खेलूँगा. मेरा दोस्त भी बास्केटबाल टीम के लिए खेलने चाहता था. हम कहते थे कि हम दोनों एक साथ टीम में बास्केटबाल खेलेंगे. टीम में खेलने के लिए सारे लोगो ने काच के सामने खेलने थे फिर काच फैसला करेगा कि कौन टीम में खेलेंग. हम काच के सामने पांच दिनों के लिए खेला. उस पांच दिनों में एक दिन काच ने मुझे उसके ऑफिस में बुलाया. में बहुत डर गया था. काच ने कहा कि मैं बास्केटबाल अच्छा खेलता हूँ लेकिन मैं तेज़ नहीं दौड़ता था. इस लिए मैं उसके बास्केटबाल टीम में नहीं खेल सकता था. मैं बहुत उदास था. मैं ने सोचा कि मैं एक बहुत अच्छा बास्केटबाल खिलाड़ी था. मुझे समज नहीं
आई कि काच मुझे उसके टीम के लिए नहीं चाहता था. काच मेरा दोस्त को पसंद था और मेरा दोस्त उसका टीम के लिए चाहता था. मैं कम से चार पांच दिनों के लिए
उदास था. मेरे माता और पिता जी मुझे बात करने कोशिस किये लेकिन मैं उनके बातो नहीं सुन सकते थे. अब मुझे जनता है कि यह एक बहुत छोटी बात है लेकिन छे
साल पहले मैं ने इस बात बहुत बड़ी बात बनाया. मैं बहुत उदास था और इस दुखी में मैं ज्यादा बास्केटबाल खेला ताकि मैं बेहतर बन सकता है.
जब मैं उदास थी - Neha Garg
एक दिन जब मैं क्लास के लिए घर से निकल रही थी, मेरे पिताजी का फोन आया था. मेरे माता-पिता अमेरिका में नहीं रहते तो में सोच रही थी की मेरे पिता इतना सुबह-सुबह क्यों फोन कर रहे थें. जैसे मैंने फोन उठाया मेरे पिताजी ने कहा की उनके पास बुरा खबर है. फिर उन्होंने मुझे बताया की मेरे नाना की मौत हो गया. उस वक़्त मैं कुछ नहीं बोल सकी, मुझे विश्वास ही नहीं हो रही थी. मेरे नाना बिल्कुल ठीक थें, और फिर एक दम से यह हुआ. बाद में मेरे पिताजी ने बताया की मेरे नाना को "हेअर्त अत्तैक" हुआ था. जब मैंने फोन राखी, मैं एक दम रोने लगी. मेरे दोस्तों सब सो रहे थे क्योंकि सिर्फ मेरे पास सुबह की क्लास थी. मैं फिर बे मन से क्लास के लिए गई. क्लास में बैठकर मुझे सिर्फ रोने का मन था लेकिन मुझको सब के सामने नहीं रोना था. मुझे तो सिर्फ अपनी माँ से बात करनी थी. क्लास के बाद मैंने तीन चार बार अपनी माँ को फोन किया और जैसे उन्होंने फोन उठाया मैं फिर से रोने लगी. माँ ने मुझे संजय की ज़िन्दगी में ऐसे चीज़े होते हैं और हमको सब मजबूत रहना चाहिए. मैं अपनी माता-पिता को मदद भी नहीं कर सकती थी क्योंकि वे भारत में थे और मैं अमेरिका में थी. मैं भारत जाने वाली थी ताकि मैं अपनी बेहें और माता पिता के लिए थी लेकिन माँ ने मना करदिया था. मैं और अपनी जुड़वाँ भाई जो कनाडा में पढता है एक दुसरे से बात कर रहे थे और मेरे दोस्तों भी मुझको मुस्कुराना करने की कोशिश की. मैं अभी भी नाना को याद करती हूँ.
होमवर्क बारह
आठ अक्टूबर से पहले मैं कहता कि मेरा सबसे बुरा दिन था जब मैंने अपनी परीक्षा असफल की या फिर वह दिन जब मैंने अपने परिवार के साथ लड़ी की. काश मैं अभी भी कह सकता कि वह मेरे सबसे बुरे दिन थे. लेकिन आठ अक्टूबर के बाद हर दिन एक दुखी दिन रहा हैं. आठ अक्टूबर को मेरी माँ एक कार ऐक्सडन्ट में गुज़र गयी. मेरी माँ के साथ सात लोग और थे लकिन वे सब ठीक थे. मैं अब मेरी माँ के साथ कभी नहीं बात कर सकूँगा. मैं उन का खाना नहीं खा सकूँगा. वह मुझ पर कभी नहीं चिल्लाएंगी या मेरी मदद करेगी. वह मुझे हर दिन फोन नहीं करेगी. मुझे उन से बहुत सीखना था लेकिन अब यह नामुमकिन है. शब्द मेरी भावनाओं का वर्णन नहीं कर सकते हैं. एक बात मैं ज़रूर कह सकता हूँ: मुझे बहुत अकेला महसूस हो रहा है भले ही यहाँ कई लोग हैं मेरी मदद करने के लिए. आप कह सकते हैं कि मैं एक "मामा'स बॉय" था और अब मैं समझा कि यह बुरी बात नहीं है. आप सोच रहे हैं कि मैं आपको यह सब क्यों कह रहा हूँ? मुझे आपकी दया नहीं चाहिये. मैंने सोचा कि आप को जानना चाहिये कि यह कभी और कहीं भी हो सकता है. आप के पास अभी भी समय हैं अपने माता पिता से बात करने के लिए और उन से कुछ सिखने के लिए. यह समय मत बर्बाद करें और व्यर्थ चीजों पर मत चिंता करें.
Subscribe to:
Posts (Atom)